सोमवार, नवंबर 28

Yaajan Se Priy-Upbhog

याजन से प्रिय-उपभोग 

प्रेम या ज्ञान
         ज्योंहि जीवन को उत्फुल्ल  करता है,
                 त्योंहि याजन-प्रवृति उदग्रीव होने लगती है
                          नाना प्रकार नूतन मनुष्य की खोज में ;--
वह कहना चाहता है नाना तरह से, नाना ढंग से
         अपना प्रिय जो है उनकी ही बातें,
                  और भोग करना चाहता है
                           नाना तरह से
                                    ऐसा करके ;--
जभी देखोगे
         यह खोज-बीन
                 और यह प्राप्ति
                           थमती जा रही है,
          प्रिय के बोध और वृद्धि भी
                  तुम्हारे भीतर
                            मूढ़ हो रहे हैं  !   |58|

--: श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र, चलार साथी 

Yaajan Mein Unnayan

याजन में उन्नयन 

याजन
           याजित जो है
                     उसे नवीन करके
                              नाना तरह से उपभोग कराता है ; --
                     इसीलिये, ज्ञान या प्रेम का याजन
                              उन्नति का एक
                                       सहज सोपान है !    |57|

--: श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र, चलार साथी 

रविवार, नवंबर 20

Yaajan Ki Apravruti Mein Gyaan Aur Bodh Ki Deenata

याजन की अप्रवृति में ज्ञान और बोध की  दीनता 

जभी देखोगे
        तुम्हारी याजन-प्रवृति दीन हो रही है
               या
                       रुक गई है,
                                 ठीक समझो,
तुम्हारे अन्तर के बोध
        और
                उपभोग
                         दिनोंदिन स्थविर होने लगे हैं
                                   और हो रहे हैं !            |56|

--: श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र, चलार साथी 

Yathaarth Prem

यथार्थ प्रेम 

प्रेम मनुष्य के अन्तर को उच्छल करके
         पारिपार्श्विक में उत्सारित होकर
                  प्रिय की सेवा और याजन से
                             प्रतिष्ठा करता है ; --
और, ऐसा लक्षण जहाँ नहीं है
         वहाँ संदेह करो,
                  समझने की चेष्टा करो  !   |55|

--: श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र, चलार साथी 

शुक्रवार, नवंबर 18

Vivek

विवेक 

पारिपार्श्विक की चेतनासूचक प्रतिक्रिया --
           जो स्मृति और ज्ञान बनकर मस्तिष्क में है--
                    उसका अनुधावन करना ही है विवेक,
और, उस प्रकार अनुधावन करके
           जो कर्तव्य निश्चित करते हैं
                    वे ही हैं विवेकी !            |54|

--: श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र, चलार साथी 

गुरुवार, नवंबर 17

Aadarsh--Shaitaan Ki Maya

आदर्श--शैतान की माया 

यदि तुम
      ऐसे किसी में
             प्रलुब्ध होकर
                      अपने आदर्श को अतिक्रम करो, --
                               किन्तु अपने आदर्श को
                                        लक्ष्य बनाकर नहीं,
                                                 प्रतिष्ठित करके भी नहीं,
समझो,
           शैतान की माया में
                  तुम मुग्ध और प्रलुब्ध हुए हो,--
                           अभी लौटने पर
                                    निस्तार को स्पर्श कर सकते हो !   |53|


--: श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र, चलार साथी 

Prem--Vipreet Sanghaat Mein

प्रेम- विपरीत संघात में 

भाव, भक्ति, प्रेम
         यदि उसके विपरीत संघात में
                  उद्दाम नहीं हुआ, --
                          तो वह पहले कभी था या नहीं
                                   संदेहयोग्य बात है !     |52|

--: श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र, चलार साथी 

बुधवार, नवंबर 16

Premaaspad Yaajan Mein

प्रेमास्पद याजन में 

स्वतः उत्सारित प्रेमास्पद का गुणगान
         और उनके याजन में स्वभाव-सिद्धता
                 खिंचाव या  प्रेम का
                        एक चरित्रगत लक्षण है ; --
         इसमें ही समझा जाता है
                 कि प्रेमास्पद को लेकर
                        वह सुस्थ और दीप्त है !    |51|

--: श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र, चलार साथी 

Kaamdaman Mein Prem

कामदमन में प्रेम 

प्रेम को अवलंबन किये बगैर
          जो काम को दमन करने जाता है
                  साधारणतः विकट उत्थान में
                           काम ही उसे
                                   विध्वस्त कर देता है !     |50|

--: श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र, चलार साथी 

सोमवार, नवंबर 14

Kaam Ki Chaah

काम की चाह 

काम चाहता है
           काम्य को
                 अपनी चाह के अनुसार
                        उपहार पाना,
                              वह काम्य को
                                     सम्वृद्ध बनाने की बला को
                                            वहन करने में बिल्कुल गैरराजी रहता है,--
यदि उसमें
          उसके भोग का किसी प्रकार
                 व्यतिक्रम न हो;  --
         इसलिये काम मनुष्य को
                 मूढ़ बनाकर
                        उसके जगत से चोरी करके,
उतना तक अपनी सीमा में आबद्ध 
                                   रखना चाहता है
जितनी भोगलिप्सा
                   उसे जिससे उद्दीप्त बनाये रखे ;--
           और उसके अवसान में ही
                   सबका अवसान है !
           इसलिये उसकी वृद्धि नहीं है,
                   जीवन और यश संकोचशील है,
          तमसा के अतल गह्वर में
                   मरण-प्रहेलिका सहित
                          उसकी स्थिति है--
                                 वही पाप है,
                   इसलिये वह दुर्बल, अवसन्न और अज्ञान है,
                          समझ कर देखो कि,
                                 क्या चाहते हो ?   |49|

--: श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र, चलार साथी  

Prem Ki Chaah

प्रेम की चाह 

प्रेम या प्रीति चाहती है
       अपने प्रेमास्पद को
             अपना जो कुछ है
                   सबको निचोड़ कर
                          जीवन, यश और वृद्धि में
                                 प्रतिष्ठा करना ; ---
प्रेमास्पद ही उसका परमस्वार्थ है,  
        वह ऐसा नहीं चाहता है,
              जो उनके प्रिय को
                     स्वार्थमंडित नहीं करता है, --
              वह अपने जगत में ढूंढ़कर
                     जो भी पाता है --
                            जीवन, यश व वृद्धि के अनुकूल--
वही लाकर
       अपने प्रेमास्पद को सुसज्जित कर
               अपने को सार्थक विवेचना करता है,--
       और, उसमें ही उसकी पुष्टि, तृप्ति और मुक्ति है ; --
वह उन्हें छोड़कर स्वाधीन होना नहीं चाहता,
        प्रिय की अधीनता,
               प्रिय की सेवा ही,
                       उसके धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष हैं; ---
ऐसा कर
        प्रेम अपने प्रिय को
बोध, ज्ञान, कर्म, जीवन और ऐश्वर्य में
        प्रतुल करके
                अज्ञान भाव से स्वयं भी
                      प्रतुल में प्रतिष्ठित होता है--
इसीलिये,
        प्रेम इतना निष्पाप है,
                 प्रेम इतना महान है !             |48|

--: श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र, चलार साथी 

शनिवार, अप्रैल 2

Aadarsh Yaa Guru Aur Aadarshaurakti

आदर्श या गुरु और आदर्शानुरक्ति 

जिनकी सेवा, साहचर्य और अनुरक्ति सहित अनुसरण 
मनुष्य को जीवन, यश और वृद्धि में 
क्रमोन्नत कर दे, -- 
जिनके प्रति एकान्तिक अनुरक्ति वा भक्ति 
अटूट भाव से निबद्ध रहने पर 
पारिपार्श्विक और जगत 
उसमें किसी प्रकार विक्षेप नहीं ला सके, 
वह विक्षिप्त संघात सम्वद्ध व विन्यस्त होकर, 
सार्थकता लाभ करके, 
भाव, ज्ञान और बोध में सम्वृद्ध होकर 
अमृत को आलिंगन करे 
वे ही हैं आदर्श, इष्ट या गुरु ; -- 
इसलिये
इष्ट, आदर्श या गुरु में एकान्तिक अनुरक्ति 
मनुष्य के जीवन के हित में उतना आवश्यक है ; 
धर्म को अटूट कर 
जीवन को वहन करने में ये आदर्श, इष्ट या गुरु ही हैं 
प्रधान आवश्यकीय |
तुम उनमें अपनी अनुरक्ति, भक्ति, प्रेम को न्यस्त करके-- 
उनको ही परम स्वार्थ विवेचना कर 
उनका ही अनुसरण करो-- 
कृतार्थ होगे !  |47|

--: श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र, चलार साथी

Sanghaat Mein Chetanaa Aur Dharm

संघात में चेतना और धर्म 

तुम चेतन तभी हो
जभी तुम्हारा पारिपार्श्विक 
तुममें संघात पैदा करता है 
और, यही चेतनता ही है 
तुम जो जीवन में हो 
उसका ही अभ्रांत साक्ष्य !
ऐसा होने पर तुम्हारा पारिपार्श्विक 
तुममें जैसा संघात पैदा करेगा 
तुम्हारे भाव, बोध व वृत्ति का 
वैसा ही समावेश होगा ; 
ऐसा यदि होता है-- 
तो वह करना ही धर्म है 
जिसमें तुम अपने पारिपार्श्विक को लेकर 
जीवन, यश व वृद्धि के क्रमवर्द्धन में 
वर्धित हो सको-- 
और, तुम वही बोलो, वही आचरण करो, 
उसका ही अनुष्ठान करो 
जिससे तुम अपने पारिपार्श्विक में 
वैसा बन सको ! -- 
देखोगे 
अमंगल, अशुभ और भय से 
कितना त्राण पाते हो !  |46|

--: श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र, चलार साथी

रविवार, मार्च 27

Aadarshpraanataa Ka Saakshy

आदर्शप्राणता का साक्ष्य 


तुम जितना ही आदर्श में स्वार्थप्राण होगे-- 
सेवा में दक्षता, कार्य में निपुणता, 
बात व व्यवहार में मधुरता, 
सहानुभूति व सम्बर्द्धना--
ये तुम्हारे चरित्र को अनुलिप्त कर 
तुम्हारे पारिपार्श्विक में प्रतिफलित होंगे ही-- 
तुम आदर्श में जो स्वार्थ प्राण हुए हो, 
उनकी प्रतिष्ठा ही जो तुम्हारा परमस्वार्थ है-- 
यह आग्रह ही 
तुम्हें बाध्य कराके, 
किन्तु  अज्ञात भाव से 
ऐसा बना डालेगा !--
और यही है 
तुम्हारी आदर्शप्राणता का साक्ष्य !  |45|

--: श्री श्री ठाकुर अनुकूलचन्द्र, चलार साथी

मंगलवार, मार्च 22

Amrut Aur Maran

अमृत और मरण 

तुम जितना ही बहु में अनुरक्त होगे-- 
हर में हर ढ़ंग से-- 
एक को उपलक्ष बनाये बगैर,
तभी वह हर अनुरक्ति 
पृथक भाव से, 
नाना तरह से 
विच्छिन्न-वृति की 
सृष्टि सहित 
तुम्हें छिन्न-भिन्न करके 
तुम्हारे मूढ़त्व व मरण का पथ परिष्कार करेगी,-- 
और, जभी तुम 
एकानुरक्ति को अवलंबन  करके 
बहु को आलिंगन करोगे-- 
वह बहु और बहु से सृष्ट वृत्तियाँ 
वही एकानुरक्ति में निरोध लाभ कर 
क्रमान्वय में विन्यस्त होकर 
बोध व ज्ञान की उद्दीपना सहित 
अमृत को निमंत्रित करेगी !  |44|

--: श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र, चलार साथी

Sevaviheen Ki Daavi

सेवाविहीन की दावी 

मनुष्य की सेवा-- 
जिससे वह स्वस्ति, शांति 
और आनंद पाता है, 
अंततः ऐसा कुछ किये बगैर 
लेने के समय 
अपना कहकर दावी करके 
लेने मत जाओ ;-- 
उससे प्राप्ति तो होगी ही नहीं, 
बल्कि लांछना व अवज्ञा ही 
तुम्हें 
अपघात से क्षुब्ध कर देगी !  |43|

--: श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र, चलार साथी

Shaitaan Ahm Ka Niyantran

शैतान अहं का नियंत्रण 

तुम्हारा अहंकार जभी 
दूसरे को छोटा बनाकर 
या अस्वीकार कर 
अपने को प्रतिष्ठित करना चाहता है 
तभी उसे शैतान अहं समझकर 
पहचान लो ; -- 
तुम अहं को इसप्रकार 
नियोजित करो-- 
जिसमें उसे परिचालित कर 
अपने पारिपार्श्विक के 
जीवन, यश और वृद्धि को 
आमंत्रित कर सको !  |42|

--: श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र, चलार साथी

Ahm Ki Sevaa

अहंमकी सेवा 

सेवा जहाँ स्वास्थ्य, आनन्द
और उन्नति नहीं ला सके 
 किन्तु परिश्रम, उत्कंठा 
और आकुलता 
सब ही व्यर्थता में निःशेष हो जाता है-- 
तो निश्चय जानो 
वह सेवा अहंमकी सेवा है !  |41|

--: श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र, चलार साथी

Sevaheen Shushrooshaa

सेवाहीन शुश्रूषा 

सेवा का अर्थ वही है--
जो मनुष्य को 
सुस्थ, स्वस्थ, उन्नत और आनन्दित कर दे ; 
और, जहाँ ऐसा नहीं, 
बल्कि शुश्रूषा है, 
वह सेवा अपलाप को ही 
आवाहन  करती है !  |40|

--: श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र, चलार साथी

गुरुवार, मार्च 17

Sanchay Aur Seva

संचय और सेवा 

संचय करो,-- 
किन्तु सेवा के लिये !
तुम्हारा संचय यदि 
सेवा की ही पूजा न करे, 
तो निश्चय जानो-- 
वह 
उसी के लिये है 
जो वर्द्धन को क्षुन्न करता है !  |39|

--: श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र, चलार साथी 

Ripudaman

रिपुदमन 

काम, क्रोधादि रिपुओं को 
दमन करने के प्रयास में 
बेचैन मत होओ,--
वही बेचैनी का भाव 
उनकी प्रतिष्ठा ही करता है ; 
बल्कि उद्दीप्त रिपु को 
ऐसे किसी भी चित्ताकर्षक 
विषय या भाव में लगाकर 
उसे निरस्त करो 
जिससे उसका प्रश्न ही 
तुम्हारे मस्तिष्क में कम उठे ;-- 
देखोगे, रिपु को आयत करना कितना सहज है !  |38|

--: श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र, चलार साथी 

Chaurya Ki Parinati

चौर्य की परिणति 

चोरी मत करो ;--
चाह की धृष्ट बुद्धिवृति 
किसी को भी 
उदवृत किये वगैर 
अन्याय ढंग से, अज्ञात भाव से 
परिपूरित होना चाहती है--
वही है चौर्य ; 
चौर्य से बुद्धिवृति दिनोंदिन 
दूसरे को क्षति पहुँचाकर
अपकर्ष  की दिशा में अदृश्य हो जाती है 
अर्थात, कर्म के द्वारा 
जिसे करके इच्छा की पूर्ति करने में 
बोध व ज्ञान के उन्मेष से वह प्राप्ति होती है-- 
वही चौर्य से आहत व अवसन्न होकर 
अधर्म को आलिंगन करता है 
इसीलिये उतनी घृणा, उतना पाप, उतनी हीनता है-- 
इसीलिये कहता हूँ, 
इस चौर्यबुद्धि को प्रश्रय देकर 
अपना एवं पारिपार्श्विक का 
सर्वनाश न करो 
सावधान हो जाओ !  |37|

--: श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र, चलार साथी

Swaarth

स्वार्थ 

जिससे प्राप्ति हो रही है-- 
उसे पूरण कर, उच्छल करके 
प्राप्ति को अवाध करना ही 
स्वार्थ का तात्पर्य है;-- 
प्राप्ति के उत्स की पूर्ति करने के बजाय 
जहाँ ग्रहणमुखर  हो जाता है, 
स्वार्थ वहाँ भ्रान्ति के कवल में पड़कर 
म्लान और मुह्यमान है निश्चय !  |36|

--: श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचंद्र, चलार साथी

Krodh Mein Doordarsha

क्रोध में दुर्दशा 

क्रोध जिसे क्षिप्त कर 
स्वार्थान्धता के वशीभूत होकर 
दूसरे को व्याहत करता है, 
दुर्दशा 
दिग्विजयी होकर 
अट्टहास करके उसका अनुसरण करती है !  |35| 

--: श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र, चलार साथी

Lobh

लोभ 

यथोपयुक्त प्रयोजन को 
अतिक्रम कर 
अतिरिक्त की उदग्रीव आकांक्षा को ही 
लोभ कहा जा सकता है ; -- 
तुम उस अतिक्रमण से 
सावधान रहो, 
कारण, वह तुम्हें 
अवसन्नता में परिचालित कर 
मृत्यु में निःशेष कर सकता है !  |34|

--: श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र, चलार साथी

Karya Nishfal Mein Deerghsootrataa

कार्य-निष्फल में दीर्घसूत्रता 

दीर्घसूत्रता आलस्य का ही सम्बंधी है-- 
कार्य निष्फल करने के गुरुदेव हैं !-- 
जो करना है
तत्क्षण करके 
दीर्घसूत्रता को विदा कर दो ;-- 
दक्षता और कार्यसिद्धि 
तुम्हारी अनुचर होगी !  |33|

--: श्री श्री ठाकुर अनुकूलचंद्र, चलार साथी

Daridrata Ka Bandhu

दरिद्रता का बंधु

आलस्य, अविश्वास, आत्मम्भरिता 
और अकृतज्ञता की तरह 
बंधु या मित्र रहने से 
दरिद्रता को और खोजना नहीं पड़ेगा;-- 
यहाँ तक कि इनमें से कोई एक भी 
दरिद्रता का ऐसा बंधु हैं-- 
इनमें से किसी को छोड़कर 
जो नहीं रह सकता, 
ऐसा धन यदि तुम्हारे अन्तर में 
बसोबास करता है, 
दुःख के अभाव की बलाई को 
और सहन नहीं करना पड़ेगा !   |32|

--: श्री श्री ठाकुर अनुकूलचन्द्र, चलार साथी

Vanchana

वंचना 

यदि वंचना  का प्रेम 
अटूट रखना चाहते हो तो 
जिसे पाकर 
पुष्ट हो रहे हो, 
उसे पुष्ट करने के धंधे में 
क्यों कष्ट उठाओगे ?  |31|

--: श्री श्री ठाकुर अनुकूलचंद्र, चलार साथी

Prayojan Ke Anupooran Mein

प्रयोजन के अनुपूरण में  

आलस्य को प्रश्रय मत दो, 
सेवा-तत्पर हो,
संवर्द्धना  में 
मनुष्य को अभिनंदित करो,-- 
साध्यानुसार, जैसा कर सकते हो 
दूसरे के प्रयोजन के अनुपूरक हो,-- 
स्वयं तुष्ट और तृप्त रहकर 
दूसरे को तुष्ट और तृप्त करो,-- 
देखोगे, 
बिना चाहे भी 
अर्थ, ऐश्वर्य तुममें 
अवाध होकर रहेगा, 
दरिद्रता-- दूर में खड़ी होकर 
तुम्हें अभिवादन करेगी !  |30|

--: श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचंद्र, चलार साथी